Thursday, April 22, 2010

जो लड़खड़ाये नही वो भी कहाँ पहुंचे
जो बैठ रहे तेरे दर पे कहाँ कहाँ पहुँचे
वहाँ के ज़िक्र से भी परहेज़ उनको था
उनको ढूँढते उस रात हम जहाँ पहुँचे
नई राहों पे चल दिये थे दो चार दीवाने
कहते हैं उनको मंजिलें वो जहाँ पहुँचे

2 comments:

  1. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  2. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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