Wednesday, September 7, 2011

एक टुकड़ा प्यास को तरसता रहा पानी 
सहरां की तपती रेत पे बरसता रहा पानी 
कहाँ वो पहाड़ और अब ये नरक के घाट 
घर वापसी को बेचैन तडपता रहा पानी
पेड़ों की याद में जो हुआ करते थे कभी
गीली लकडियों सा सुलगता रहा पानी 
उतारा पहाड़ ने तो खुर्शीद की शह पर
फ़िर बादल पे चढ़ के मंडराता रहा पानी 

Saturday, September 3, 2011

महबूब की एक नज़र थी नहीं रही
जिंदगी बस एक सफर थी नहीं रही
और तो खैर क्या होता मर जाने से 
बेकार की खटर पटर थी नहीं रही
होना न होना नज़र का धोखा है
सागर में एक लहर थी नहीं रही 
सुना था कि जल्द सब ठीक होगा 
बासी सी एक खबर थी नहीं रही 

Friday, September 2, 2011

रोशनी नहीं है या कहो अन्धेरा है
हमको हरहाल ग़ुरबत ने घेरा है
सिवाय यादों के कुछ नहीं यहाँ 
ये दिल है कि भूतों का बसेरा है 
चंद मुर्दा मुलाकातों के एहसास 
वक्त ने किस कदर मुंह फेरा है 
कुछ खुशनसीबों को पता नहीं 
जुल्फों के सिवा भी कुछ घनेरा है 
दिल है तेरा मगर फ़िर भी दर्द है 
न जाने क्या मेरा है क्या तेरा है 
लोग कहते हैं ये अच्छी गज़ल है
मैंने दर्दो गम का मंज़र उकेरा है 
कुछ भी नहीं जो हमेशा साथ रहे 
क्या है यहाँ जिसे कहिये मेरा है

Thursday, September 1, 2011

दवाओं से न बन पड़े तो दुआ करे कोई
दुआओं का मारा हो तो क्या करे कोई
दो चार ही हों तो रास्ता दिखाये कोई
भटके हुये काफ़िले का क्या करे कोई
अँधेरा बहुत हो तो सूरज उतार लायें
बन्द खिड़कियों का क्या करे कोई
हरेक ख़्वाब हकीकत हो जाये अगर  
फ़िर किस उम्मीद पे जिया करे कोई

Tuesday, August 30, 2011

निपटेंगे दुश्मनों से खुद किसी तरह 
दोस्तों से खुदा मेरे बचाना हमें तुम 
दिल अगर हो भी तो शीशे का न हो
अबके इस तरह से बनाना हमें तुम 
आंधियों एक चिराग हूँ बस आखिरी  
खुद अपने हाथों से जलाना हमें तुम 
खबर करेंगे जब जख्म पुराने भरेंगे 
दोस्तों आके फ़िर से सताना हमें तुम

Thursday, August 25, 2011

कभी किसी की ज़िंदगी में ऐसी रात न हो
वो यूँ चले जा रहे हैं जैसे कोई बात न हो
मर जायेंगे अगर बोझ है ज़िंदगी लेकिन 
फ़िर क्या करेंगे जो ग़मों से निजात न हो 
अब फ़िर से बनाना मुझको तो इस तरह 
आँख में आंसू न हो सीने में जज्बात न हो 
क्यों खुश बैठ रहें अगर देनेवाला तू ही है 
जब तक हमारे कदमो में कायनात न हो 
लेकिन इन्ही लोगों का तो ये जिम्मा था  
ये देखना कि लोगों पे जोर ज़ुल्मात न हो 
बावजूद पहरे के कारवाँ लुट गया कैसे
देखो ये कहीं रहबर की करामात न हो

Monday, August 22, 2011

यूँहीं चले आये वो रस्म निभाने के लिए 
लकडियाँ काफी थी हमें जलाने के लिए
कुछ इस तरह सुनते रहे वो हमारी अर्ज
जैसे कोई लोरी गाता हो सुलाने के लिए
क्या जानिये कैसे रंग गया पंजा उनका
मेंहदी तो मिल पाई नहीं रचाने के लिए
ज़ाहिद के समझाने से तय हो गया अब 
यही एक चीज है पीने पिलाने के लिए

Tuesday, August 16, 2011

न बाँधो ज़ोर से मुट्ठी ज़िन्दगी रेत है फ़िसल जायेगी

कब्र की ओर नहीं तो बता ज़िन्दगी किधर जायेगी

जैसे ओस की बूँद है कांपती हुई घास की नोंक पर

ये ज़िंदगी बस एक हवा के झोंके से बिखर जायेगी

हारने को कुछ नहीं और जीतने को दुनिया पड़ी है

फिर नहीं कोई और बाज़ी अब इससे बेहतर आएगी

ज़िंदगी दरिया की मौज औ तिनके सी हस्ती अपनी

चाहें न चाहें हम ये तो ले ही जायेगी जिधर जायेगी

Wednesday, August 10, 2011

सोमरस कहते थे देवता जिसको 
आगे चलके वही शराब हो गई
पाक किताबों में ज़िक्र है इसका
हमने पी ली तो खराब हो गई 
खुशी हो या गम मसले बहुत हैं 
ये हर सवाल का जवाब हो गई
और ही ढंग से पिलाई साकी ने 
मैकदे में भीड़ बेहिसाब हो गई 

Tuesday, August 2, 2011

रहजनों की अगुआई में चल रहे हैं काफिले 
याँ किसी को आजकल रहबरी आती नहीं
उनके हक में है बीमार अच्छा न होने पाए
ऐसा नहीं कि उनको चारागरी आती नहीं
नाज़ो अंदाज़ तो अब भी खूब है दुनिया में 
लेकिन हर किसी को दिलबरी आती नहीं
हर एक बात पर संजीदा हो जाते हैं लोग 
समझ में किसी की मसखरी आती नहीं 
वही कहता है जो ग़ालिबो मीर कह चुके 
कहते हैं मिसिर को शायरी आती नहीं 

Thursday, July 28, 2011

किससे मांगिये कुछ भी
जहाँ मे कौन अमीर है
कुछ तो मांग है सबकी
हर एक यहाँ फ़कीर है
इश्के हकीकी के सिवा
दुनिया मे सब हकीर है
देखा नहीं उसे किसी ने
केवल वही बेनजीर है 
जिसके दम पे सब नूर है 
ये उसकी ही तस्वीर है

Tuesday, July 26, 2011

रहजनों की अगुआई में हैं काफिले 
दुनिया में आज कोई रहबर नहीं है
हुकूमत करने वाले थोड़े से लोग हैं 
बरबादी का जिम्मा सब पर नहीं है
उनके हक में है बीमार अच्छा न हो
ऐसा नहीं कि कोई चारागर नहीं है 
हर बात में सबसे ऊपर कौन है यहाँ 
आदमी आदमी से बढ़कर नहीं है 
भीड़ के धोके में मत रहना मिसिर 
कोई भी यहाँ तेरा हमसफ़र नहीं है 
कत्अः
बचे होते तेरी निगाह से तो कहते
इससे तेजतर कोई नश्तर नहीं है 
हमने भी करके देखा मीर साहब 
नशा होशियारी से बेहतर नहीं है 
उसकी कोई शक्ल है नहीं फ़िर भी  
कोई शक्ल उससे बेहतर नहीं है

Monday, July 25, 2011

उनकी बात ही सुना कुछ और है
हकीकत मैने जाना कुछ और है
तेरी साफगोई का भरोसा कर लूँ 
नज़र कहती मगर कुछ और है 
भली लगती है बात ज़ाहिद की 
मजमूने बयाँ मगर कुछ और है 
इंसान खुद को समझते हैं जरूर
हमारी हरकतें मगर कुछ और हैं 
ईमानदारी अच्छी बात है लेकिन 
जीने का तरीका तो कुछ और है
दीखता तो हम जैसा ही है मगर 
मिसिर आदमी ही कुछ और है 

Saturday, July 23, 2011

टिकी हो जिनकी रोज़ी रोटी मसलों पर
मसाइल रोज़ी रोटी के वे सुलझायें क्यों
हमदर्दी के सिवा कुछ कर सके है कौन
किसी को जख्म अपने दिखलायें क्यों 
जंजीरों को जेवर समझ के खुश हैं लोग
हकीकत मुश्किल हो तो समझाएं क्यों 
इनसे बेहतर होगा इनका बनाने वाला
इन सूरतों से फ़िर दिल को बहलायें क्यों
देखा तो नहीं किसी को लौट कर आते 
ये तय हो तो फ़िर मौत से घबराएं क्यों 
ठीक रस्ते पर ये दुनिया चल रही हो 
तो फ़िर नसीहतें मिसिर फरमाएं क्यों 

Friday, July 22, 2011

आदमी फूलों के ख़्वाब बुनता है
हकीकत में पत्थरों को चुनता है
कहते रहें कुछ भी आपकी मर्ज़ी 
वो तो जो चाहता है वही सुनता है
हर कोई मजे में है यहाँ सिवा मेरे
इसी गम में हर शख्स भुनता है
लोग नहीं बदलने वाले ज़रा भी 
मिसिर तू बेकार में सर धुनता है

Thursday, July 21, 2011

देख तो ये जहाँ अब भी है आबाद 
कुछ भी तो नहीं बदला मेरे बाद
ख़ाक थी मिल गई खाक में हस्ती 
रूह पहले भी थी और रही आज़ाद 
जो चल पड़े पा गए मंजिल आखिर
कुछ पत्थरों से करते रहे फ़रियाद 
रहनुमाओं की कमीं नहीं रही और 
हर दौर में ज़माना यूंही रहा बरबाद 

Monday, July 18, 2011

मंजिलें पूछती फिरती रहीं पता मेरा
नाकामी अपनी किस्मत थी सो रही
उनके वादे पे कभी ऐतबार नहीं रहा 
इन्तिज़ार अपनी आदत थी सो रही 
ज़िम्मा रहबरी का उठा लिया लेकिन
रहजनी उनकी फितरत थी सो रही 
मुसलसल ज़िक्रे-मय से हुआ मालूम 
ज़ाहिद की जो सोहबत थी सो रही 
मुहाफिज़ मुकर्रर किया गया हमको
ज़िंदगी उसकी अमानत थी सो रही 

Wednesday, July 6, 2011

शिकायतों का दौर खत्म हो तो कुछ बात करें
तोहमतों  पे जोर खत्म हो तो कुछ बात करें
मसले नाजुक हैं ज़रा गौर से सुनने होंगे 
गोलियों का शोर खत्म हो तो कुछ बात करें 
गड़े मुर्दे उखाड़ने से तो कुछ नहीं हासिल
लाशें बिछाना खत्म हो तो कुछ बात करें
झगड़ा हमारा है हमीं से सुलझेगा बेहतर
दखल गैर का खत्म हो तो कुछ बात करें
इंसानियत को तरक्की और अमन चाहिए 
बमों का खौफ़ खत्म हो तो कुछ बात करें 
खुद को डसने लगें हैं आस्तीनों के सांप 
अब उनके ठौर खत्म हों तो कुछ बात करें

Tuesday, July 5, 2011

मंजिलें पूछती फिरतीं हैं पता उनका
जो सिर्फ रास्तों के वफादार हो गए
मत ढूँढते फिरो कूये यार में दोस्तों
वो तो जाने कब के सरेदार हो गए
वफ़ा की उम्मीद तो हमें थी लेकिन
वो अपनी फितरत से लाचार हो गए
आदमी थे काम के सुना है हमने भी
एक मुद्दत से मिसिर बेकार हो गए

Monday, May 23, 2011

उम्र भर लोगों का तांता लगा रहा
हम कि अकेले ही उम्र गुजार आये
न हुई उनसे मुलाकात किसी तरह
कहने को हम करीब सौ बार आये
वक्त उठने का गुलशन से आ गया
मेरी बला से अगर अब बहार आये