Friday, November 11, 2011

कुछ इस तरह से जमाने ने मिटाया है 
ढूँढता फिरता मुझको मेरा ही साया है
कभी हँसे हैं लोग कभी तंज भी कसे हैं 
हमने बारहा जमाने पे तरस खाया है
खुद में होते तो फिक्र अपनी भी करते 
वक्त ने मुझको मेरे पास नहीं पाया है 
तुम आखिर क्यों इसका हिसाब करो 
मैंने भला क्या खोया और क्या पाया है 
न मानो तो किताबें खोल कर पढ़ लो 
अपने खुदा को तुम्ही ने तो बनाया है 

Monday, October 17, 2011

गर्दन झुकाई नजरें उठाई ज़रा मुस्करा दिया 
बिना तलवार उसने कितनों को गिरा दिया 
अक्सर तो ज़िंदगी में दोपहर की सी धूप थी  
जुल्फों की घनी छाँव ने सबको आसरा दिया 
छोटा बड़ा अच्छा बुरा नाम क्या बदनाम क्या 
वक्त के साथ जमाने ने सबको बिसरा दिया 
दुनिया में अबतक लड़के तो जीता नहीं कोई 
मुहब्बत करने वालों ने परचम लहरा दिया 
या तो लोग अपने ही दुश्मन हैं या बेवकूफ 
हमने मसीहाओं को ही कातिल ठहरा दिया 
किस खेत की मूली हो तुम आखिर मिसिर 
रोटी की फिकिर ने सबको यहाँ घबरा दिया 

Friday, October 7, 2011

आँखों में समाकर दिल में उतर गए 
नाम पे मेरे जो महफ़िल में मुकर गए 
उनके आने तक तो हम होश में ही थे  
न जाने वो फ़िर कब और किधर गए 
पूछा किये उनसे अपना पता अक्सर 
फ़िर लेकर उन्ही से अपनी खबर गए 
इन्ही आँखों ने उनको जाते हुये देखा 
ऐसे भी कुछ हादिसे हम पे गुजर गए 
बागबाँ से लड़ के गुलशन से अब हम 
इसी शाम निकले नहीं तो सहर गए 

Wednesday, October 5, 2011

साथ चलो तो वक्त सर पे उठा लेता है 
आगे चलने की मगर ये सजा देता है 
ये किताब भी किसी काम की न रही 
हर कोई अब इसे माथे से लगा लेता है 
पत्थरों का हो या हीरों का क्या फर्क 
चाहे जिसका भी हो बोझ डुबा देता है 
क्या क्या न सितम होते हैं ज़िंदगी में  
आदमी मरने पे उसे खुदा बना देता है 
सुनता तो नहीं कोई बातें मसीहा की 
उसके पीछे से मगर रस्म चला देता है 
लिख लिख के गज़ल लोग कहते हैं 
मिसिर बस रामकहानी सुना देता है 

Sunday, October 2, 2011

बड़ी मुश्किल है ये जो कभी मचल जाये
दिल कोई बच्चा तो नहीं जो बहल जाये
दोनों जहां भी देकर देखो इक बार इसे 
शायद मान जाये शायद ये संभल जाये 
इसने तो मेरा जीना हराम कर दिया है  
कोई ले जाये ये दिल दूसरा बदल जाये 
एक ही है तमन्ना इस दिल में बसी हुई  
तुम आओ किसी रोज तो निकल जाये
जो तोड़ना हो दिल तो एक इल्तिजा है 
ये देखना कहीं पता इसे न चल जाये 

Friday, September 30, 2011

वेद ओ कुरआन को हम भी कामिल समझते थे 
मील का पत्थर निकला जिसे मंजिल समझते थे 
उनकी भी सोहबत में गुज़ार के वक्त देख लिया 
अपने जैसे ही निकले जिन्हें काबिल समझते थे 
न हम उनकी जुबाँ समझे न वो मेरी जुबाँ समझे 
वीराना सा लगा मुझको जिसे महफ़िल समझते थे 
मरते रहने के सिवा तो कुछ न हुआ जिन्दगी से 
कैसे नासमझ थे जो मौत को कातिल समझते थे 
न ज़न्नत न दोजख कुछ न पाया मरने के बाद  
बेकार ही हम ज़िंदगी का ये हासिल समझते थे 
उसमे से कितना तो लहू इंसानियत का बह गया 
बस किताब ही निकली जिसे नाजिल समझते थे 
कामिल - पूर्ण 
खैरमकदम - स्वागत
नाजिल - अवतरित 

Wednesday, September 28, 2011

यहाँ कितनों को रहनुमाई का शौक है 
आदमी आज ढूँढे से जहाँ नहीं मिलता 
ये कैसी बहार है और कैसा है ये चमन 
एक भी फूल देखिये यहाँ नहीं खिलता 
इस कदर बेहिसी कि कटते रहें दरख्त 
पत्ता भी मगर इस बाग का नहीं हिलता 
हमारी नाफर्मानियों का हिसाब नहीं 
इतनी कि अब तो खुदा भी नहीं गिनता 
इतनी किताबें और इस कदर जाहिली 
बेहतर था मिसिर तू और नहीं लिखता 

Monday, September 12, 2011

अब इस दुनिया को जब फ़िर से बनाया जाएगा 
हुक्मरानों के सीनों में भी दिल लगाया जायेगा 
खेमों में बाँट रखना जालसाजी है सियासत है 
लकीरें जो हैं नहीं कहीं उनको मिटाया जाएगा 
अगर दिल में मुहब्बत हो तो फ़िर तेरा मेरा क्या 
पत्थर की दीवारों को शीशे से गिराया जायेगा
सर को झुकाए रखना इंसानियत की तौहीन है 
गर्दन पर जब तलक है शान से उठाया जाएगा 

Thursday, September 8, 2011

सुबह की शाम हर शब की सहर होती है
ये हकीकत तो हमपे रोज जबर होती है 
हर वक्त आने वाले पल का इन्तिज़ार 
जिन्दगी अपनी बस यूँही बसर होती है 
नहीं बच पाता है बीमार इश्क में कोई  
जब तक कि चारागर को खबर होती है
आँखों में ही कटती है हमारे घर में रात 
उनके यहाँ तो पल भर में सहर होती है 
यहाँ जिन्दगी जब भी रहगुज़र होती है 
एक बस मौत ही तो हमसफर होती है 

Wednesday, September 7, 2011

एक टुकड़ा प्यास को तरसता रहा पानी 
सहरां की तपती रेत पे बरसता रहा पानी 
कहाँ वो पहाड़ और अब ये नरक के घाट 
घर वापसी को बेचैन तडपता रहा पानी
पेड़ों की याद में जो हुआ करते थे कभी
गीली लकडियों सा सुलगता रहा पानी 
उतारा पहाड़ ने तो खुर्शीद की शह पर
फ़िर बादल पे चढ़ के मंडराता रहा पानी 

Saturday, September 3, 2011

महबूब की एक नज़र थी नहीं रही
जिंदगी बस एक सफर थी नहीं रही
और तो खैर क्या होता मर जाने से 
बेकार की खटर पटर थी नहीं रही
होना न होना नज़र का धोखा है
सागर में एक लहर थी नहीं रही 
सुना था कि जल्द सब ठीक होगा 
बासी सी एक खबर थी नहीं रही 

Friday, September 2, 2011

रोशनी नहीं है या कहो अन्धेरा है
हमको हरहाल ग़ुरबत ने घेरा है
सिवाय यादों के कुछ नहीं यहाँ 
ये दिल है कि भूतों का बसेरा है 
चंद मुर्दा मुलाकातों के एहसास 
वक्त ने किस कदर मुंह फेरा है 
कुछ खुशनसीबों को पता नहीं 
जुल्फों के सिवा भी कुछ घनेरा है 
दिल है तेरा मगर फ़िर भी दर्द है 
न जाने क्या मेरा है क्या तेरा है 
लोग कहते हैं ये अच्छी गज़ल है
मैंने दर्दो गम का मंज़र उकेरा है 
कुछ भी नहीं जो हमेशा साथ रहे 
क्या है यहाँ जिसे कहिये मेरा है

Thursday, September 1, 2011

दवाओं से न बन पड़े तो दुआ करे कोई
दुआओं का मारा हो तो क्या करे कोई
दो चार ही हों तो रास्ता दिखाये कोई
भटके हुये काफ़िले का क्या करे कोई
अँधेरा बहुत हो तो सूरज उतार लायें
बन्द खिड़कियों का क्या करे कोई
हरेक ख़्वाब हकीकत हो जाये अगर  
फ़िर किस उम्मीद पे जिया करे कोई

Tuesday, August 30, 2011

निपटेंगे दुश्मनों से खुद किसी तरह 
दोस्तों से खुदा मेरे बचाना हमें तुम 
दिल अगर हो भी तो शीशे का न हो
अबके इस तरह से बनाना हमें तुम 
आंधियों एक चिराग हूँ बस आखिरी  
खुद अपने हाथों से जलाना हमें तुम 
खबर करेंगे जब जख्म पुराने भरेंगे 
दोस्तों आके फ़िर से सताना हमें तुम

Thursday, August 25, 2011

कभी किसी की ज़िंदगी में ऐसी रात न हो
वो यूँ चले जा रहे हैं जैसे कोई बात न हो
मर जायेंगे अगर बोझ है ज़िंदगी लेकिन 
फ़िर क्या करेंगे जो ग़मों से निजात न हो 
अब फ़िर से बनाना मुझको तो इस तरह 
आँख में आंसू न हो सीने में जज्बात न हो 
क्यों खुश बैठ रहें अगर देनेवाला तू ही है 
जब तक हमारे कदमो में कायनात न हो 
लेकिन इन्ही लोगों का तो ये जिम्मा था  
ये देखना कि लोगों पे जोर ज़ुल्मात न हो 
बावजूद पहरे के कारवाँ लुट गया कैसे
देखो ये कहीं रहबर की करामात न हो

Monday, August 22, 2011

यूँहीं चले आये वो रस्म निभाने के लिए 
लकडियाँ काफी थी हमें जलाने के लिए
कुछ इस तरह सुनते रहे वो हमारी अर्ज
जैसे कोई लोरी गाता हो सुलाने के लिए
क्या जानिये कैसे रंग गया पंजा उनका
मेंहदी तो मिल पाई नहीं रचाने के लिए
ज़ाहिद के समझाने से तय हो गया अब 
यही एक चीज है पीने पिलाने के लिए

Tuesday, August 16, 2011

न बाँधो ज़ोर से मुट्ठी ज़िन्दगी रेत है फ़िसल जायेगी

कब्र की ओर नहीं तो बता ज़िन्दगी किधर जायेगी

जैसे ओस की बूँद है कांपती हुई घास की नोंक पर

ये ज़िंदगी बस एक हवा के झोंके से बिखर जायेगी

हारने को कुछ नहीं और जीतने को दुनिया पड़ी है

फिर नहीं कोई और बाज़ी अब इससे बेहतर आएगी

ज़िंदगी दरिया की मौज औ तिनके सी हस्ती अपनी

चाहें न चाहें हम ये तो ले ही जायेगी जिधर जायेगी

Wednesday, August 10, 2011

सोमरस कहते थे देवता जिसको 
आगे चलके वही शराब हो गई
पाक किताबों में ज़िक्र है इसका
हमने पी ली तो खराब हो गई 
खुशी हो या गम मसले बहुत हैं 
ये हर सवाल का जवाब हो गई
और ही ढंग से पिलाई साकी ने 
मैकदे में भीड़ बेहिसाब हो गई 

Tuesday, August 2, 2011

रहजनों की अगुआई में चल रहे हैं काफिले 
याँ किसी को आजकल रहबरी आती नहीं
उनके हक में है बीमार अच्छा न होने पाए
ऐसा नहीं कि उनको चारागरी आती नहीं
नाज़ो अंदाज़ तो अब भी खूब है दुनिया में 
लेकिन हर किसी को दिलबरी आती नहीं
हर एक बात पर संजीदा हो जाते हैं लोग 
समझ में किसी की मसखरी आती नहीं 
वही कहता है जो ग़ालिबो मीर कह चुके 
कहते हैं मिसिर को शायरी आती नहीं 

Thursday, July 28, 2011

किससे मांगिये कुछ भी
जहाँ मे कौन अमीर है
कुछ तो मांग है सबकी
हर एक यहाँ फ़कीर है
इश्के हकीकी के सिवा
दुनिया मे सब हकीर है
देखा नहीं उसे किसी ने
केवल वही बेनजीर है 
जिसके दम पे सब नूर है 
ये उसकी ही तस्वीर है