Monday, June 28, 2010

ख्वाहिशें तो मेरी भी हज़ारों हैं फ़िक्र मेरी करो
अपने किये कुछ होता नहीं है फ़िक्र मेरी करो
जाम भरो बुलाओ साकी को सजाओ महफ़िल
जल्दी करो ये ज़रूरी इन्तेजाम फ़िक्र मेरी करो
नहीं कि न जाओ गैर की महफ़िल में तुम मगर
कभी भूले से सही इधर भी आओ फ़िक्र मेरी करो
सिर्फ़ जीते रहने को तो नहीं कहते हैं ज़िन्दगी
कुछ तो लाओ सामान खुशी का फ़िक्र मेरी करो
फ़िर आयेगा सुबह उसके डूबने का गम न करो
सूरज नहीं एक नन्हा चिराग हूँ फ़िक्र मेरी करो

Monday, May 3, 2010

जी मे है कि बहार आने तक रुकूँ
बागबान भी मगर अपना नहीं है
खुली रहें या मुंद जायें क्या फ़र्क
कोई अगर आँख मे सपना नहीं है
सुधरेगी कभी दुनिया तो सोचेंगे
फ़िलहाल तो यहाँ रहना नहीं है
बेकार बैठे से तो कटती नहीं है
काम मगर कोई करना नहीं है
भला बुरा वो जो चाहे करवाये
हमे किसी बात से डरना नहीं है

Wednesday, April 28, 2010

बड़ी देर से सब हमको समझा रहे हैं
बुरी बात है फ़िर भी किये जा रहे हैं
पता है कि गलत राह है मगर हम
दोस्तों के साथ को चले जा रहे हैं
फ़िर पे टाला है फ़िर एक बार उनने
वो हमें और हम नसीब आज़मा रहे हैं

Monday, April 26, 2010

वक्त के साथ ज़रूर कदम मिलाये चलिये
बीते हुये वक्त को दिल मे बसाये चलिये
कौन जाने कि फ़ूलों का फ़ैशन चला जाये
एहतियातन काटों से भी निभाये चलिये
कोई तो ऐसा हो जिसे सबसे छुपाना हो
किसी को तो दिल की बात बताये चलिये
कुछ तो जरूर हुस्न वालों से भी सीखिये
बात बेबात चाहने वालों को सताये चलिये
सम्भालिये खूब होशियारी से वजन को
बढ़ाके बात में और बदन मे घटाये चलिये

Thursday, April 22, 2010

जो लड़खड़ाये नही वो भी कहाँ पहुंचे
जो बैठ रहे तेरे दर पे कहाँ कहाँ पहुँचे
वहाँ के ज़िक्र से भी परहेज़ उनको था
उनको ढूँढते उस रात हम जहाँ पहुँचे
नई राहों पे चल दिये थे दो चार दीवाने
कहते हैं उनको मंजिलें वो जहाँ पहुँचे

Thursday, March 11, 2010

इस तरह से मोहब्बत में सनम गुफ़्तगू होनी चाहिये
जुबाँ पर आये न आये बात दिल तक पहुँचनी चाहिये
माना दो दिन बीत गये पर दो दिन और बचे भी हैं
दिल मे रहेगा हौसला तो किस्मत भी सँवरनी चाहिये
बहुत कोहराम मचा रखा है उसके परदे ने अजल से
आगे दुनिया को बढ़ाना है तो निकाब उठनी चाहिये
माना कुछ और भी देखने को है महबूब के सिवा यहाँ
लेकिन पहले तो उसके चेहरे से निगाह हटनी चाहिये
रोज़े अब्र भी खूब थे और शबे माहताब भी गुज़रीं कई
जिस तरह मेरी कटी ज़िन्दगी सबकी गुज़रनी चाहिये

Tuesday, March 9, 2010

इसी वहम में शहीदाने वतन पड़े होंगे
यहाँ उनकी मजारों पर मेले लगे होंगे
कौन जाने वे लोग जब हम सो रहे थे
आग मे तपे होंगे कि बर्फ़ मे गले होंगे
मुस्कराते डोलते रहे आँधियों मे बेखौफ़
यकीनन वे चिराग तूफ़ानो मे पले होंगे
गिरते हैं लोग सभी लेकिन जो हार गये
इक और बार फ़िर उठके न चले होंगे

Monday, March 8, 2010

लोग जब अपना काम करते हैं
तब वे सबका काम करते हैं
हम ही नहीं अच्छे लोग भी
ज़िन्दगी यूँही तमाम करते हैं
बड़ी मुश्किल से होती है सुबह
यूँही सुबह को शाम करते हैं
ज़िन्दगी भर गालियाँ जबाँ पे
मरने पर राम राम करते हैं
अच्छे करते हैं छुपते छुपाते
खराब वही सरेआम करते हैं
सिर्फ़ हमीं करते हैं अच्छा
और सब बुरे काम करते हैं
सब उसी की सूरते हैं यहाँ
हम सब को सलाम करते हैं
गालियाँ देते हैं बुरा कहते हैं
सब लोग मेरा नाम करते हैं
सारे बैठे रहते हैं निठल्ले
मिसिर को बदनाम करते हैं

Saturday, March 6, 2010

जिनकी सादगी पे मर मिटे हैं
आके पूछते हैं कौन मर गया
लोगों ने सरे दार मुझे देखा
उनका उठा के मैं सर गया
रसूख देखिये मेरे कातिल का
ये इल्ज़ाम भी मेरे सर गया
खींच के मेरे ही बगल से छुरी
वो शोख वार हमी पे कर गया

Friday, March 5, 2010

ख़ाक हो रहेगा दिल
उसकी ज़िद यही है
कुछ भी कहो तुम
सही बात नहीं है
कहेंगे पता है मगर
ये नई बात नहीं है
रोते कटी अपनी
इसका रोना नहीं है
कहाँ जाते हो उधर
मेरा वो घर नहीं है
सुनो दिल की ज़रा
इसको सुकून नहीं है
जहाँ रखो कदम
दुनिया मेरी वहीं है
क्या दूँ कुछ भी तो
यहाँ मेरा नहीं है
अपने तो कहेंगे ही
मिसिर बुरा नहीं है

Thursday, March 4, 2010

कमी हसीनो की न थी जहाँ मे
तुम उनमे मुझे लेकिन भा गये
मैकदे की इज़्ज़त का सवाल था
निकले तो हम भी लड़खड़ा गये
आलम पे छाये थे किसी वक्त
ढूँढो तो वो अब लोग कहाँ गये
फ़ूल जैसे थे कुचले गये बेवजह
कुछ लोग मगर खुशबू लुटा गये
गालिबोमीर तो खुदायेसुखन ठहरे
लेकिन मिसिर तुम भी छा गये

Wednesday, March 3, 2010

दिल हो जाता है गैर सुना था
लेकिन इस कदर न पता था
दावा सबको उस पर जरूर था
कोई कभी लेकिन न मिला था
ढूँढते बेकार मुझको यहाँ वहाँ
तू ही तो था अब मै कहाँ था
उसको खोजते पहुँचे तो मगर
दैरो हरम नहीं मैकदा वहाँ था

Tuesday, March 2, 2010

रुसवाई के डर से जो यहाँ नहीं आते
मत पूछिये कि कहाँ कहाँ नहीं जाते
कभी याद भूले ही उनको आयें हम
भूले से भी हमसे भुलाये नहीं जाते
नजर न लग जाये उनकी आँखो को
दिल के ये जख्म दिखाये नहीं जाते
होते हैं किस्से बयान नज़रों से ख़ास
होठों पे कभी हरगिज़ लाये नहीं जाते

Monday, March 1, 2010

मैयत पर उनको देख कर अपनी ये अफ़सोस हुआ
उनके आने का भरोसा होता तो पहले ही मर रहते
तीर कमाँ में और सैयाद कमीं में लाख हो उड़ जाते
दरवाज़ा कफ़स का खुला मिल गया होता पर रहते
रंगोखुशबू के बिना काँटों सा खूब जिये तो भी क्या
बेहतर था भले सुबह खिलते शाम तलक झर रहते
चुप बैठ के सहने से तो उसके ज़ुल्म कम होने न थे
सुनता न सुनता वो जाने तुम अपनी तो मगर कहते

Sunday, February 28, 2010

हजार बार बच के गुजर गये जिस जगह
न बचने का जी हुआ सो अब के गिर पड़े
मतलब तो खैर हमको आरामतलबी से था
सब जा रहे थे देखा तो हम भी चल पड़े
आह ये सुर्खरू ये ज़िन्दगी से भरे भरे बदन
चाहते तो हैं भले न इनसे छूटते बन पड़े

Saturday, February 27, 2010

लोग चले भी गये मना के ईद
हमे इन्तिज़ार ही रहा चाँद का
रात रात भर अटारी से बेशरम
चाँद चेहरा तके है मेरे चाँद का
अँधेरी रात है आज तो होता
अब भरोसा रहा नहीं चाँद का
अभी बाहों में छुपेगा देखना
कैसे रंग बदलता है चाँद का
इश्क की पाक नज़र की कसम
हमने देखा नहीं दाग़ चाँद का

Friday, February 26, 2010

नज़्म

पीना कुफ़्र समझने वालों
साकी से आँख चुराने वालों
खनखन प्याले की सुन डर जाने वालों
शबनम के कतरों से प्यास बुझाने वालों
करूँ ज़िक्रे चश्मे बहिस्त तुमसे तो कैसे करूँ
झूठ दिलासा देने वालों
बेमतलब समझाने वालों
सहर के गीत सुनाने वालों
देर शाम जाते हुये खुर्शीद ने जिसके बाद
फ़िर लौट के आने का वादा ही न किया हो
करूँ उस सियाह रात की सुबह आह तो कैसे करूँ
इत्र का सौदा करने वालों
बहार पे दाँव लगाने वालों
चमन के ख्वाब सजाने वालों
खुशबुयें आवारा हैं बह जाती हैं बह जायेंगीं
नाहक ही हवायें कसूरवार कही जायेंगी
तू ठीक ही कहने आई है ये बात ऐ सबा
फ़ूल का दिल तोड़ूँ तेरा मददगार बनूँ या
इश्क की रीत पर हुस्न का तरफ़दार रहूँ
करूँ ऐसे मुआमलात का हल तो कैसे करूँ
मोटी पोथी पढ़ने वालों
बड़ी किताबें लिखने वालों
फ़िक्रे दुनिया में जीने वालों
ज़िन्दगी हर कदम आज़माये चली जाती है
और इसी कशमकश में खत्म हुई जाती है
इधर या उधर कुछ न भी हासिल हो मगर
जब तक सरहदें हैं किसी ओर तो रहना ही है
गुल ही नहीं काँटों से भी निबाह करना ही है
बात सीधी सी है दिल भी लेकिन दिल ठहरा
करूँ इसको समझने पे मज़बूर तो कैसे करूँ

Thursday, February 25, 2010

जब तुम्हारे साथ पीता हूँ
मैं तुम्हारा साथ पीता हूँ
तौबा कर लेता हूँ भूल से
तौबा को भूलकर पीता हूँ
जीने को बीमार पीते होंगे
मैं पीने के लिये जीता हूँ
पीने का क्या खास दिन
हर शब हर रोज़ पीता हूँ
जाम भरकर खिसका भी दे
बुरा माने बगैर पीता हूँ
कैसे भी कोई पिलाये कभी
मैं बड़ी खुशी से पीता हूँ
बहिस्त मे पियाले हों न हों
मुँह से चुल्लू लगाके पीता हूँ

Wednesday, February 24, 2010

नज़्म

और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से
मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा

छलकते हुये पियालों को शर्म आ गई होगी
थरथराते लबों पर तबस्सुम छा गई होगी
परदा नहीं था और वो परदा कर रहा होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा

रेशमी आरिजों पर रंगे हिना छा गया होगा
वो शोख पत्थर का सनम पिघल रहा होगा
कली सा वो बदन चटक कर गुल बना होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा

मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से
यूँ चले आओ चुपके से किसी को खबर न हो
गुजारने को बस एक रात जिसकी सहर न हो
जिस के बगैर गुज़ारना मेरे लिये भी गुनाह है
खुदा करे उसका मेरे बगैर पल भर गुज़र न हो
किस्मत मे अबके लिखना जो मन का हो मेरे
सीने मे दिल और दिमाग मे कोई हुनर न हो
कहाँ चल दिये घर से ठंड में सुबह इबादत को
बता दे कोई तो ऐसी जगह खुदा जिधर न हो
लें मोल जो पढ़ना चाहें खुली किताब मै नहीं
रहने ही दीजिये इतनी भी कुव्वत अगर न हो