ख्वाहिशें तो मेरी भी हज़ारों हैं फ़िक्र मेरी करो
अपने किये कुछ होता नहीं है फ़िक्र मेरी करो
जाम भरो बुलाओ साकी को सजाओ महफ़िल
जल्दी करो ये ज़रूरी इन्तेजाम फ़िक्र मेरी करो
नहीं कि न जाओ गैर की महफ़िल में तुम मगर
कभी भूले से सही इधर भी आओ फ़िक्र मेरी करो
सिर्फ़ जीते रहने को तो नहीं कहते हैं ज़िन्दगी
कुछ तो लाओ सामान खुशी का फ़िक्र मेरी करो
फ़िर आयेगा सुबह उसके डूबने का गम न करो
सूरज नहीं एक नन्हा चिराग हूँ फ़िक्र मेरी करो
भगवान मीर, चचा ग़ालिब, मियाँ दाग, अंकल फ़िराक, दादा फ़ैज़, मस्त जिगर, भइया मजाज़ ..और भी तमाम हैं जो जिम्मेदार हैं कुछ अच्छा बन पड़ा हो तो !
Monday, June 28, 2010
Monday, May 3, 2010
Wednesday, April 28, 2010
Monday, April 26, 2010
वक्त के साथ ज़रूर कदम मिलाये चलिये
बीते हुये वक्त को दिल मे बसाये चलिये
कौन जाने कि फ़ूलों का फ़ैशन चला जाये
एहतियातन काटों से भी निभाये चलिये
कोई तो ऐसा हो जिसे सबसे छुपाना हो
किसी को तो दिल की बात बताये चलिये
कुछ तो जरूर हुस्न वालों से भी सीखिये
बात बेबात चाहने वालों को सताये चलिये
सम्भालिये खूब होशियारी से वजन को
बढ़ाके बात में और बदन मे घटाये चलिये
बीते हुये वक्त को दिल मे बसाये चलिये
कौन जाने कि फ़ूलों का फ़ैशन चला जाये
एहतियातन काटों से भी निभाये चलिये
कोई तो ऐसा हो जिसे सबसे छुपाना हो
किसी को तो दिल की बात बताये चलिये
कुछ तो जरूर हुस्न वालों से भी सीखिये
बात बेबात चाहने वालों को सताये चलिये
सम्भालिये खूब होशियारी से वजन को
बढ़ाके बात में और बदन मे घटाये चलिये
Thursday, April 22, 2010
Thursday, March 11, 2010
इस तरह से मोहब्बत में सनम गुफ़्तगू होनी चाहिये
जुबाँ पर आये न आये बात दिल तक पहुँचनी चाहिये
माना दो दिन बीत गये पर दो दिन और बचे भी हैं
दिल मे रहेगा हौसला तो किस्मत भी सँवरनी चाहिये
बहुत कोहराम मचा रखा है उसके परदे ने अजल से
आगे दुनिया को बढ़ाना है तो निकाब उठनी चाहिये
माना कुछ और भी देखने को है महबूब के सिवा यहाँ
लेकिन पहले तो उसके चेहरे से निगाह हटनी चाहिये
रोज़े अब्र भी खूब थे और शबे माहताब भी गुज़रीं कई
जिस तरह मेरी कटी ज़िन्दगी सबकी गुज़रनी चाहिये
जुबाँ पर आये न आये बात दिल तक पहुँचनी चाहिये
माना दो दिन बीत गये पर दो दिन और बचे भी हैं
दिल मे रहेगा हौसला तो किस्मत भी सँवरनी चाहिये
बहुत कोहराम मचा रखा है उसके परदे ने अजल से
आगे दुनिया को बढ़ाना है तो निकाब उठनी चाहिये
माना कुछ और भी देखने को है महबूब के सिवा यहाँ
लेकिन पहले तो उसके चेहरे से निगाह हटनी चाहिये
रोज़े अब्र भी खूब थे और शबे माहताब भी गुज़रीं कई
जिस तरह मेरी कटी ज़िन्दगी सबकी गुज़रनी चाहिये
Tuesday, March 9, 2010
Monday, March 8, 2010
लोग जब अपना काम करते हैं
तब वे सबका काम करते हैं
हम ही नहीं अच्छे लोग भी
ज़िन्दगी यूँही तमाम करते हैं
बड़ी मुश्किल से होती है सुबह
यूँही सुबह को शाम करते हैं
ज़िन्दगी भर गालियाँ जबाँ पे
मरने पर राम राम करते हैं
अच्छे करते हैं छुपते छुपाते
खराब वही सरेआम करते हैं
सिर्फ़ हमीं करते हैं अच्छा
और सब बुरे काम करते हैं
सब उसी की सूरते हैं यहाँ
हम सब को सलाम करते हैं
गालियाँ देते हैं बुरा कहते हैं
सब लोग मेरा नाम करते हैं
सारे बैठे रहते हैं निठल्ले
मिसिर को बदनाम करते हैं
तब वे सबका काम करते हैं
हम ही नहीं अच्छे लोग भी
ज़िन्दगी यूँही तमाम करते हैं
बड़ी मुश्किल से होती है सुबह
यूँही सुबह को शाम करते हैं
ज़िन्दगी भर गालियाँ जबाँ पे
मरने पर राम राम करते हैं
अच्छे करते हैं छुपते छुपाते
खराब वही सरेआम करते हैं
सिर्फ़ हमीं करते हैं अच्छा
और सब बुरे काम करते हैं
सब उसी की सूरते हैं यहाँ
हम सब को सलाम करते हैं
गालियाँ देते हैं बुरा कहते हैं
सब लोग मेरा नाम करते हैं
सारे बैठे रहते हैं निठल्ले
मिसिर को बदनाम करते हैं
Saturday, March 6, 2010
Friday, March 5, 2010
Thursday, March 4, 2010
Wednesday, March 3, 2010
Tuesday, March 2, 2010
Monday, March 1, 2010
मैयत पर उनको देख कर अपनी ये अफ़सोस हुआ
उनके आने का भरोसा होता तो पहले ही मर रहते
तीर कमाँ में और सैयाद कमीं में लाख हो उड़ जाते
दरवाज़ा कफ़स का खुला मिल गया होता पर रहते
रंगोखुशबू के बिना काँटों सा खूब जिये तो भी क्या
बेहतर था भले सुबह खिलते शाम तलक झर रहते
चुप बैठ के सहने से तो उसके ज़ुल्म कम होने न थे
सुनता न सुनता वो जाने तुम अपनी तो मगर कहते
उनके आने का भरोसा होता तो पहले ही मर रहते
तीर कमाँ में और सैयाद कमीं में लाख हो उड़ जाते
दरवाज़ा कफ़स का खुला मिल गया होता पर रहते
रंगोखुशबू के बिना काँटों सा खूब जिये तो भी क्या
बेहतर था भले सुबह खिलते शाम तलक झर रहते
चुप बैठ के सहने से तो उसके ज़ुल्म कम होने न थे
सुनता न सुनता वो जाने तुम अपनी तो मगर कहते
Sunday, February 28, 2010
Saturday, February 27, 2010
Friday, February 26, 2010
नज़्म
पीना कुफ़्र समझने वालों
साकी से आँख चुराने वालों
खनखन प्याले की सुन डर जाने वालों
शबनम के कतरों से प्यास बुझाने वालों
करूँ ज़िक्रे चश्मे बहिस्त तुमसे तो कैसे करूँ
झूठ दिलासा देने वालों
बेमतलब समझाने वालों
सहर के गीत सुनाने वालों
देर शाम जाते हुये खुर्शीद ने जिसके बाद
फ़िर लौट के आने का वादा ही न किया हो
करूँ उस सियाह रात की सुबह आह तो कैसे करूँ
इत्र का सौदा करने वालों
बहार पे दाँव लगाने वालों
चमन के ख्वाब सजाने वालों
खुशबुयें आवारा हैं बह जाती हैं बह जायेंगीं
नाहक ही हवायें कसूरवार कही जायेंगी
तू ठीक ही कहने आई है ये बात ऐ सबा
फ़ूल का दिल तोड़ूँ तेरा मददगार बनूँ या
इश्क की रीत पर हुस्न का तरफ़दार रहूँ
करूँ ऐसे मुआमलात का हल तो कैसे करूँ
मोटी पोथी पढ़ने वालों
बड़ी किताबें लिखने वालों
फ़िक्रे दुनिया में जीने वालों
ज़िन्दगी हर कदम आज़माये चली जाती है
और इसी कशमकश में खत्म हुई जाती है
इधर या उधर कुछ न भी हासिल हो मगर
जब तक सरहदें हैं किसी ओर तो रहना ही है
गुल ही नहीं काँटों से भी निबाह करना ही है
बात सीधी सी है दिल भी लेकिन दिल ठहरा
करूँ इसको समझने पे मज़बूर तो कैसे करूँ
साकी से आँख चुराने वालों
खनखन प्याले की सुन डर जाने वालों
शबनम के कतरों से प्यास बुझाने वालों
करूँ ज़िक्रे चश्मे बहिस्त तुमसे तो कैसे करूँ
झूठ दिलासा देने वालों
बेमतलब समझाने वालों
सहर के गीत सुनाने वालों
देर शाम जाते हुये खुर्शीद ने जिसके बाद
फ़िर लौट के आने का वादा ही न किया हो
करूँ उस सियाह रात की सुबह आह तो कैसे करूँ
इत्र का सौदा करने वालों
बहार पे दाँव लगाने वालों
चमन के ख्वाब सजाने वालों
खुशबुयें आवारा हैं बह जाती हैं बह जायेंगीं
नाहक ही हवायें कसूरवार कही जायेंगी
तू ठीक ही कहने आई है ये बात ऐ सबा
फ़ूल का दिल तोड़ूँ तेरा मददगार बनूँ या
इश्क की रीत पर हुस्न का तरफ़दार रहूँ
करूँ ऐसे मुआमलात का हल तो कैसे करूँ
मोटी पोथी पढ़ने वालों
बड़ी किताबें लिखने वालों
फ़िक्रे दुनिया में जीने वालों
ज़िन्दगी हर कदम आज़माये चली जाती है
और इसी कशमकश में खत्म हुई जाती है
इधर या उधर कुछ न भी हासिल हो मगर
जब तक सरहदें हैं किसी ओर तो रहना ही है
गुल ही नहीं काँटों से भी निबाह करना ही है
बात सीधी सी है दिल भी लेकिन दिल ठहरा
करूँ इसको समझने पे मज़बूर तो कैसे करूँ
Thursday, February 25, 2010
जब तुम्हारे साथ पीता हूँ
मैं तुम्हारा साथ पीता हूँ
तौबा कर लेता हूँ भूल से
तौबा को भूलकर पीता हूँ
जीने को बीमार पीते होंगे
मैं पीने के लिये जीता हूँ
पीने का क्या खास दिन
हर शब हर रोज़ पीता हूँ
जाम भरकर खिसका भी दे
बुरा माने बगैर पीता हूँ
कैसे भी कोई पिलाये कभी
मैं बड़ी खुशी से पीता हूँ
बहिस्त मे पियाले हों न हों
मुँह से चुल्लू लगाके पीता हूँ
मैं तुम्हारा साथ पीता हूँ
तौबा कर लेता हूँ भूल से
तौबा को भूलकर पीता हूँ
जीने को बीमार पीते होंगे
मैं पीने के लिये जीता हूँ
पीने का क्या खास दिन
हर शब हर रोज़ पीता हूँ
जाम भरकर खिसका भी दे
बुरा माने बगैर पीता हूँ
कैसे भी कोई पिलाये कभी
मैं बड़ी खुशी से पीता हूँ
बहिस्त मे पियाले हों न हों
मुँह से चुल्लू लगाके पीता हूँ
Wednesday, February 24, 2010
नज़्म
और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से
मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा
छलकते हुये पियालों को शर्म आ गई होगी
थरथराते लबों पर तबस्सुम छा गई होगी
परदा नहीं था और वो परदा कर रहा होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा
रेशमी आरिजों पर रंगे हिना छा गया होगा
वो शोख पत्थर का सनम पिघल रहा होगा
कली सा वो बदन चटक कर गुल बना होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा
मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से
मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा
छलकते हुये पियालों को शर्म आ गई होगी
थरथराते लबों पर तबस्सुम छा गई होगी
परदा नहीं था और वो परदा कर रहा होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा
रेशमी आरिजों पर रंगे हिना छा गया होगा
वो शोख पत्थर का सनम पिघल रहा होगा
कली सा वो बदन चटक कर गुल बना होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा
मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से
यूँ चले आओ चुपके से किसी को खबर न हो
गुजारने को बस एक रात जिसकी सहर न हो
जिस के बगैर गुज़ारना मेरे लिये भी गुनाह है
खुदा करे उसका मेरे बगैर पल भर गुज़र न हो
किस्मत मे अबके लिखना जो मन का हो मेरे
सीने मे दिल और दिमाग मे कोई हुनर न हो
कहाँ चल दिये घर से ठंड में सुबह इबादत को
बता दे कोई तो ऐसी जगह खुदा जिधर न हो
लें मोल जो पढ़ना चाहें खुली किताब मै नहीं
रहने ही दीजिये इतनी भी कुव्वत अगर न हो
गुजारने को बस एक रात जिसकी सहर न हो
जिस के बगैर गुज़ारना मेरे लिये भी गुनाह है
खुदा करे उसका मेरे बगैर पल भर गुज़र न हो
किस्मत मे अबके लिखना जो मन का हो मेरे
सीने मे दिल और दिमाग मे कोई हुनर न हो
कहाँ चल दिये घर से ठंड में सुबह इबादत को
बता दे कोई तो ऐसी जगह खुदा जिधर न हो
लें मोल जो पढ़ना चाहें खुली किताब मै नहीं
रहने ही दीजिये इतनी भी कुव्वत अगर न हो
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