उम्र भर लोगों का तांता लगा रहा
हम कि अकेले ही उम्र गुजार आये
न हुई उनसे मुलाकात किसी तरह
कहने को हम करीब सौ बार आये
वक्त उठने का गुलशन से आ गया
मेरी बला से अगर अब बहार आये
भगवान मीर, चचा ग़ालिब, मियाँ दाग, अंकल फ़िराक, दादा फ़ैज़, मस्त जिगर, भइया मजाज़ ..और भी तमाम हैं जो जिम्मेदार हैं कुछ अच्छा बन पड़ा हो तो !
Monday, May 23, 2011
Wednesday, March 30, 2011
दीनो मज़हब के मसाइल वो हल करते रहे
मुहब्बत जिनकी फितरत थी सो करते रहे
पता उनको भी था कहाँ रख दी जबीं उनने
सजदा आदत में था शुमार सो करते रहे
चंद गैर मुतमईन लोगों से है जिंदगी में रंग
तमाम बुजदिल तो जो मिली बसर करते रहे
बिन पेंदे के घड़े निकलीं ख्वाहिशें आखिर
बेवकूफ ही थे हम सब ता उमर जो भरते रहे
मालूम हमको भी थी जन्नत की हकीकत
ग़ालिब की तरह से कहने में मगर डरते रहे
मुहब्बत जिनकी फितरत थी सो करते रहे
पता उनको भी था कहाँ रख दी जबीं उनने
सजदा आदत में था शुमार सो करते रहे
चंद गैर मुतमईन लोगों से है जिंदगी में रंग
तमाम बुजदिल तो जो मिली बसर करते रहे
बिन पेंदे के घड़े निकलीं ख्वाहिशें आखिर
बेवकूफ ही थे हम सब ता उमर जो भरते रहे
मालूम हमको भी थी जन्नत की हकीकत
ग़ालिब की तरह से कहने में मगर डरते रहे
Thursday, March 10, 2011
Friday, October 15, 2010
Monday, June 28, 2010
ख्वाहिशें तो मेरी भी हज़ारों हैं फ़िक्र मेरी करो
अपने किये कुछ होता नहीं है फ़िक्र मेरी करो
जाम भरो बुलाओ साकी को सजाओ महफ़िल
जल्दी करो ये ज़रूरी इन्तेजाम फ़िक्र मेरी करो
नहीं कि न जाओ गैर की महफ़िल में तुम मगर
कभी भूले से सही इधर भी आओ फ़िक्र मेरी करो
सिर्फ़ जीते रहने को तो नहीं कहते हैं ज़िन्दगी
कुछ तो लाओ सामान खुशी का फ़िक्र मेरी करो
फ़िर आयेगा सुबह उसके डूबने का गम न करो
सूरज नहीं एक नन्हा चिराग हूँ फ़िक्र मेरी करो
अपने किये कुछ होता नहीं है फ़िक्र मेरी करो
जाम भरो बुलाओ साकी को सजाओ महफ़िल
जल्दी करो ये ज़रूरी इन्तेजाम फ़िक्र मेरी करो
नहीं कि न जाओ गैर की महफ़िल में तुम मगर
कभी भूले से सही इधर भी आओ फ़िक्र मेरी करो
सिर्फ़ जीते रहने को तो नहीं कहते हैं ज़िन्दगी
कुछ तो लाओ सामान खुशी का फ़िक्र मेरी करो
फ़िर आयेगा सुबह उसके डूबने का गम न करो
सूरज नहीं एक नन्हा चिराग हूँ फ़िक्र मेरी करो
Monday, May 3, 2010
Wednesday, April 28, 2010
Monday, April 26, 2010
वक्त के साथ ज़रूर कदम मिलाये चलिये
बीते हुये वक्त को दिल मे बसाये चलिये
कौन जाने कि फ़ूलों का फ़ैशन चला जाये
एहतियातन काटों से भी निभाये चलिये
कोई तो ऐसा हो जिसे सबसे छुपाना हो
किसी को तो दिल की बात बताये चलिये
कुछ तो जरूर हुस्न वालों से भी सीखिये
बात बेबात चाहने वालों को सताये चलिये
सम्भालिये खूब होशियारी से वजन को
बढ़ाके बात में और बदन मे घटाये चलिये
बीते हुये वक्त को दिल मे बसाये चलिये
कौन जाने कि फ़ूलों का फ़ैशन चला जाये
एहतियातन काटों से भी निभाये चलिये
कोई तो ऐसा हो जिसे सबसे छुपाना हो
किसी को तो दिल की बात बताये चलिये
कुछ तो जरूर हुस्न वालों से भी सीखिये
बात बेबात चाहने वालों को सताये चलिये
सम्भालिये खूब होशियारी से वजन को
बढ़ाके बात में और बदन मे घटाये चलिये
Thursday, April 22, 2010
Thursday, March 11, 2010
इस तरह से मोहब्बत में सनम गुफ़्तगू होनी चाहिये
जुबाँ पर आये न आये बात दिल तक पहुँचनी चाहिये
माना दो दिन बीत गये पर दो दिन और बचे भी हैं
दिल मे रहेगा हौसला तो किस्मत भी सँवरनी चाहिये
बहुत कोहराम मचा रखा है उसके परदे ने अजल से
आगे दुनिया को बढ़ाना है तो निकाब उठनी चाहिये
माना कुछ और भी देखने को है महबूब के सिवा यहाँ
लेकिन पहले तो उसके चेहरे से निगाह हटनी चाहिये
रोज़े अब्र भी खूब थे और शबे माहताब भी गुज़रीं कई
जिस तरह मेरी कटी ज़िन्दगी सबकी गुज़रनी चाहिये
जुबाँ पर आये न आये बात दिल तक पहुँचनी चाहिये
माना दो दिन बीत गये पर दो दिन और बचे भी हैं
दिल मे रहेगा हौसला तो किस्मत भी सँवरनी चाहिये
बहुत कोहराम मचा रखा है उसके परदे ने अजल से
आगे दुनिया को बढ़ाना है तो निकाब उठनी चाहिये
माना कुछ और भी देखने को है महबूब के सिवा यहाँ
लेकिन पहले तो उसके चेहरे से निगाह हटनी चाहिये
रोज़े अब्र भी खूब थे और शबे माहताब भी गुज़रीं कई
जिस तरह मेरी कटी ज़िन्दगी सबकी गुज़रनी चाहिये
Tuesday, March 9, 2010
Monday, March 8, 2010
लोग जब अपना काम करते हैं
तब वे सबका काम करते हैं
हम ही नहीं अच्छे लोग भी
ज़िन्दगी यूँही तमाम करते हैं
बड़ी मुश्किल से होती है सुबह
यूँही सुबह को शाम करते हैं
ज़िन्दगी भर गालियाँ जबाँ पे
मरने पर राम राम करते हैं
अच्छे करते हैं छुपते छुपाते
खराब वही सरेआम करते हैं
सिर्फ़ हमीं करते हैं अच्छा
और सब बुरे काम करते हैं
सब उसी की सूरते हैं यहाँ
हम सब को सलाम करते हैं
गालियाँ देते हैं बुरा कहते हैं
सब लोग मेरा नाम करते हैं
सारे बैठे रहते हैं निठल्ले
मिसिर को बदनाम करते हैं
तब वे सबका काम करते हैं
हम ही नहीं अच्छे लोग भी
ज़िन्दगी यूँही तमाम करते हैं
बड़ी मुश्किल से होती है सुबह
यूँही सुबह को शाम करते हैं
ज़िन्दगी भर गालियाँ जबाँ पे
मरने पर राम राम करते हैं
अच्छे करते हैं छुपते छुपाते
खराब वही सरेआम करते हैं
सिर्फ़ हमीं करते हैं अच्छा
और सब बुरे काम करते हैं
सब उसी की सूरते हैं यहाँ
हम सब को सलाम करते हैं
गालियाँ देते हैं बुरा कहते हैं
सब लोग मेरा नाम करते हैं
सारे बैठे रहते हैं निठल्ले
मिसिर को बदनाम करते हैं
Saturday, March 6, 2010
Friday, March 5, 2010
Thursday, March 4, 2010
Wednesday, March 3, 2010
Tuesday, March 2, 2010
Monday, March 1, 2010
मैयत पर उनको देख कर अपनी ये अफ़सोस हुआ
उनके आने का भरोसा होता तो पहले ही मर रहते
तीर कमाँ में और सैयाद कमीं में लाख हो उड़ जाते
दरवाज़ा कफ़स का खुला मिल गया होता पर रहते
रंगोखुशबू के बिना काँटों सा खूब जिये तो भी क्या
बेहतर था भले सुबह खिलते शाम तलक झर रहते
चुप बैठ के सहने से तो उसके ज़ुल्म कम होने न थे
सुनता न सुनता वो जाने तुम अपनी तो मगर कहते
उनके आने का भरोसा होता तो पहले ही मर रहते
तीर कमाँ में और सैयाद कमीं में लाख हो उड़ जाते
दरवाज़ा कफ़स का खुला मिल गया होता पर रहते
रंगोखुशबू के बिना काँटों सा खूब जिये तो भी क्या
बेहतर था भले सुबह खिलते शाम तलक झर रहते
चुप बैठ के सहने से तो उसके ज़ुल्म कम होने न थे
सुनता न सुनता वो जाने तुम अपनी तो मगर कहते
Sunday, February 28, 2010
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